श्री साईं सच्चरित्र संदेश

"तुम्हें अपने शुभ अशुभ कर्मो का फल अवश्य ही भोगना चाहिए I यदि भोग अपूर्ण रह गया तो पुनजन्म धारण करना पड़ेगा, इसलिये मृत्यु से यह श्रेयस्कर है कि कुछ काल तक उन्हें सहन कर पूर्व जन्मों के कर्मों का भोग समाप्त कर सदेव के लिये मुक्त हो जाओ" I

"जो मुझे प्रेम से पुकारता है उसके सन्मुख मै अवलिम्ब प्रगट हो जाता हूँ" |

Monday, December 31, 2012

Happy New Year 2013

The road to SUCCESS is never straight.
There is a curb called FAILURE,
a Loop called CONFUSION;
Red Lights called ENEMIES;
Caution Lights called FAMILY;
Speed bumps called FRIENDS &
Flat Tyre called JOBS;
However, if you have a spare tyre called DETERMINATION;
an insurance called FAITH,
you will make it to a place called SUCCESS!!

"Wish You A ... Truly Fulfilling, Great, Prosperous, Blissful, Healthy, Bright, Colorful, Delightful, Mind Blowing, Energetic, Terrific & An Extremely Happy, Peaceful and Love filled  New Year 2013."
May This Year Be The Best Of All  Previous Years !!!

Monday, December 10, 2012

First Chavadi procession in Shirdi - on 10th Dec 1909

Today is the sacred day when the very first chavadi procession was held in Shirdi during the time when Shri Sai Baba lived in his flesh and blood. It was a beautiful occassion for Sai Baba. During this procession,it was known that even Baba stood facing the Chavadi. He shone with peculiar aura.It seems as if the face of Baba took over the glory of the rising sun. It was on 10th December 1909 when the first chavadi procession took place.....

Let us all read the Chapter 37 of Shri Sai Satcharitra and imagine ourselves with Baba in the Chavadi procession

Sunday, October 14, 2012

Baba's Mahasamadhi - I shall be active and vigorous even from the tomb

The day was Tuesday, the 15th of October 1918. After His Samadhi, Baba appeared in the dreams of Kaka Mahajan on 13th November 1918 and said "Wake up! Why do you sleep still? Get up and worship Me. This is the 30th day of My Samadhi. When Kaka got up and verified, it was exactly the 30th day since Baba was buried.

Immediately he summoned Kakasaheb Dikshit, Pradhan, Dhabolkar and performed worship in the  temple of Samadhi and distributed food to everyone. They spent the entire day in singing devotional songs in praise of Baba.

 Right from the day of His Samadhi, Baba has been carrying on His Mission of appearing in dreams of devotees, healing and solacing them and turning many an atheist to look to Him.Behind every noble deed of Sai Baba, the sole objective was to promote universal good but not projecting His glory.

Baba declared that He would roam around the Universe without a form or attribute. Baba worshipped His Guru as the form of the highest absolute reality and finally got united with Him. Likewise, if we give up our caprices of mind, feelings of attachment and hate and remember Baba in our thoughts, words and deeds, He will then free us from the bondage of accumulated sins of the past births. Therefore, Baba assured "I shall be Ever-Active and Vigorous even from My Tomb".

Click below to Read more on Baba's MahaSamadhi : -

Thursday, August 9, 2012

Let us Utilize the God's Gifts of Talent

Every human being is gifted with a talent, which is latent in him. The talent, merit and ability are all but the divine gifts.

God appreciates if we make a good and effective use of the talents He gifted us with.

The more we make a greater use of our talents, the more our ability and efficiency would increase. Hence, we should not hesitate to put our efforts, befitting our abilities.

Just as a bumper harvest is reaped by sowing seeds and cultivating with care, so also we are assured of God's blessings when we repose faith in Him and render selfless service to the society by the talents He gifted us. Depending on individual talents, each person will have a different set of skills.

A singer, by singing hymns in praise of the glories of God, can inculcate devotion in the hearts of people. Another one could beautifully describe God, His divine works in a fascinating manner and can create picture of God in the eye of public mind. 

Thus, if we make proper use of our talents, the Omnipresent Sai will richly reward us with His Grace. The Creator will be highly pleased if we devotionally offer a garland of flowers as service to Him from the very flowers He has created. If we put our Baba-blessed talents in serving and making people happier, Baba would be immensely pleased. We, therefore, shall become pure souls worthy of dwelling in Him.

Wednesday, June 20, 2012

ॐ साईं श्री साईं ॐ श्री साईं

ॐ साईं श्री साईं ॐ श्री साईं
श्रद्धा भक्ति नाव बने, बाबा उसे चलाये |
बाबा जी की हो कृपा, भवसागर तर जाय ||
श्री सच्चिदानंद साई महाराज को साष्टांग नमस्कार करके उनके चरण पकड़ कर हम सब भक्तों के कल्याणार्थ उनसे प्रार्थना करते है कि हे साई । हमारे मन की चंचलता और वासनाओं को दूर करो । हे प्रभु । तुम्हारे श्रीचरणों के अतिरिक्त हममें किसी अन्य वस्तु की लालसा न रहे ।

Thursday, June 14, 2012

Sai Satcharitra Sandesh

श्रीहरि या गुरु के नाम जप से मोक्ष की प्राप्ति होती है ।
 तब फिर भय और चिन्ता को स्थान ही कहाँ रह जाता है ।

Thursday, June 7, 2012

You alone can shape my spiritual destiny.

Baba! With obedience, I offer the flower of my heart to You. Do keep showering the grace of Your abundant compassion on me. The only gift I could offer is the faith I have in You. Please make use of me as a tool in your cosmic play. Protect me always and see that I move care-free under Your control. I pray to You, with total devotion, to bless me do my duties with noble thoughts and in true spirit. It is sufficient if the responsibilities entrusted to me are good and capable of being shouldered by me.

You are the Supreme Bliss that can lead me ever from behind. You alone can shape my spiritual destiny.

Tuesday, March 27, 2012

I am always with you.

I am always with you.

I will not allow you to fall.

I will be thinking of you day and night.

I will take care of you every moment.

Saturday, March 24, 2012

हर सांस देती हे साईं की याद ...

हर सांस देती हे साईं की याद ...

साईं भक्ति ने दिया साहस व धैर्य का बल

Sunday, March 11, 2012

Surrendering to me single-minded

Surrendering to me single-minded,
he who remembers me ceaselessly,
his debt is on my head,
which I shall repay by uplifting him.

Friday, March 2, 2012

श्री साईं सच्चचरित्र सन्देश

श्री साईं सच्चचरित्र सन्देश
साईं पूर्ण अंतर्ज्ञानी हैं और वे सब पहले से ही
जानते हैं I जैसे भी 

साधन भक्त के लिए उपयुक्त होता है,

 वे उसे वैसा ही नियम बताते हैं I

Sunday, February 19, 2012


महाशिवरात्रि हिन्दुओं का एक प्रमुख त्यौहार है। यह भगवान शिव का प्रमुख पर्व है।
फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। माना जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि भगवान् शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था। प्रलय की वेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते हैं। इसीलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि कहा गया। तीनों भुवनों की अपार सुंदरी तथा शीलवती गौरां को अर्धांगिनी बनाने वाले शिव प्रेतों व पिशाचों से घिरे रहते हैं। उनका रूप बड़ा अजीब है। शरीर पर मसानों की भस्म, गले में सर्पों का हार, कंठ में विष, जटाओं में जगत-तारिणी पावन गंगा तथा माथे में प्रलयंकर ज्वाला है। बैल को वाहन के रूप में स्वीकार करने वाले शिव अमंगल रूप होने पर भी भक्तों का मंगल करते हैं और श्री-संपत्ति प्रदान करते हैं।

इस दिन शिवभक्त, शिव मंदिरों में जाकर शिवलिंग पर बेल-पत्र आदि चढ़ाते, पूजन करते, उपवास करते तथा रात्रि को जागरण करते हैं। शिवलिंग पर बेल-पत्र चढ़ाना, उपवास तथा रात्रि जागरण करना एक विशेष कर्म की ओर इशारा करता है।

इस दिन शिव की शादी हुई थी इसलिए रात्रि में शिवजी की बारात निकाली जाती है। वास्तव में शिवरात्रि का परम पर्व स्वयं परमपिता परमात्मा के सृष्टि पर अवतरित होने की स्मृति दिलाता है। यहां रात्रि शब्द अज्ञान अन्धकार से होने वाले नैतिक पतन का द्योतक है। परमात्मा ही ज्ञानसागर है जो मानव मात्र को सत्यज्ञान द्वारा अन्धकार से प्रकाश की ओर अथवा असत्य से सत्य की ओर ले जाते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्री-पुरुष, बालक, युवा और वृद्ध सभी इस व्रत को कर सकते हैं। इस व्रत के विधान में सवेरे स्नानादि से निवृत्त होकर उपवास रखा जाता है। 

इस दिन मिट्टी के बर्तन में पानी भरकर, ऊपर से बेलपत्र, आक धतूरे के पुष्प, चावल आदि डालकर ‘शिवलिंग’ पर चढ़ाया जाता है। अगर पास में शिवालय न हो, तो शुद्ध गीली मिट्टी से ही शिवलिंग बनाकर उसे पूजने का विधान है।

रात्रि को जागरण करके शिवपुराण का पाठ सुनना हरेक व्रती का धर्म माना गया है। 

अगले दिन सवेरे जौ, तिल, खीर और बेलपत्र का हवन करके व्रत समाप्त किया जाता है। 

महाशिवरात्रि भगवान शंकर का सबसे पवित्र दिन है। यह अपनी आत्मा को पुनीत करने का महाव्रत है। इसके करने से सब पापों का नाश हो जाता है। हिंसक प्रवृत्ति बदल जाती है। निरीह जीवों के प्रति दया भाव उपज जाता है। ईशान संहिता में इसकी महत्ता का उल्लेख इस प्रकार किया गया है - 

॥ शिवरात्रि व्रतं नाम सर्वपापं प्रणाशनम्। आचाण्डाल मनुष्याणं भुक्ति मुक्ति प्रदायकं ॥ 


चतुर्दशी तिथि के स्वामी शिव हैं। अत: ज्योतिष शास्त्रों में इसे परम शुभफलदायी कहा गया है। वैसे तो शिवरात्रि हर महीने में आती है। परंतु फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही महाशिवरात्रि कहा गया है।ज्योतिषीय गणना के अनुसार सूर्य देव भी इस समय तक उत्तरायण में आ चुके होते हैं तथा ऋतु परिवर्तन का यह समय अत्यन्त शुभ कहा गया हैं। शिव का अर्थ है कल्याण। शिव सबका कल्याण करने वाले हैं। अत: महाशिवरात्रि पर सरल उपाय करने से ही इच्छित सुख की प्राप्ति होती है। 

ज्योतिषीय गणित के अनुसार चतुर्दशी तिथि को चंद्रमा अपनी क्षीणस्थ अवस्था में पहुंच जाते हैं। जिस कारण बलहीन चंद्रमा सृष्टि को ऊर्जा देने में असमर्थ हो जाते हैं। चंद्रमा का सीधा संबंध मन से कहा गया है। मन कमजोर होने पर भौतिक संताप प्राणी को घेर लेते हैं तथा विषाद की स्थिति उत्पन्न होती है। इससे कष्टों का सामना करना पड़ता है। 

चंद्रमा शिव के मस्तक पर सुशोभित है। अत: चंद्रदेव की कृपा प्राप्त करने के लिए भगवान शिव का आश्रय लिया जाता है। महाशिवरात्रि शिव की प्रिय तिथि है। अत: प्राय: ज्योतिषी शिवरात्रि को शिव आराधना कर कष्टों से मुक्ति पाने का सुझाव देते हैं। शिव आदि-अनादि है। सृष्टि के विनाश व पुन:स्थापन के बीच की कड़ी है। प्रलय यानी कष्ट, पुन:स्थापन यानी सुख। अत: ज्योतिष में शिव को सुखों का आधार मान कर महाशिवरात्रि पर अनेक प्रकार के अनुष्ठान करने की महत्ता कही गई है।

शिकारी कथा 

एक बार पार्वती जी ने भगवान शिवशंकर से पूछा, 'ऐसा कौन-सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्युलोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?' उत्तर में शिवजी ने पार्वती को 'शिवरात्रि' के व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई- 'एक गांव में एक शिकारी रहता था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधित साहूकार ने शिकार को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी।' 

शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भांति वह जंगल में शिकार के लिए निकला। लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल-वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो विल्वपत्रों से ढका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला। 

पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियां तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुंची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, 'मैं गर्भिणी हूं। शीघ्र ही प्रसव करूंगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब मार लेना।' शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी जंगली झाड़ियों में लुप्त हो गई। 

कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, 'हे पारधी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूं। कामातुर विरहिणी हूं। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी।' शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, 'हे पारधी!' मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊंगी। इस समय मुझे मत मारो। 

शिकारी हंसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़फ रहे होंगे। उत्तर में मृगी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान मांग रही हूं। हे पारधी! मेरा विश्वास कर, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूं। 

मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में बेल-वृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हृष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा। शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला, हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूं। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा। 

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया, उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, 'मेरी तीनों पत्नियां जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूं।' उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गया। भगवान् शिव की अनुकंपा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा। 

थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आंसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया। देवलोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहे थे। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प-वर्षा की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए'

Sunday, February 12, 2012

मेरा हाथ पकङना सांई

जब दिखता न कहीं सवेरा हो,
जब बोल न मैं कुछ पाऊँ,
और मन ही मन घबराऊँ,
तब,मेरा हाथ पकङना सांई

Thursday, January 26, 2012

साई बाबा का अदभुत आशीर्वाद

साई बाबा वास्तव मे कलियुग के भगवान हैं । कोई विश्वास करे न करे लेकिन मेरे लिये तो बाबा भगवान ही हैं । शायद बाबा का मूल मंत्र इसी लिये श्रद्धा और सबुरी है । उन्होने तो अपने भक्तो के कल्याण के लिये ही शायद इस मंत्र से दीक्षित करने की दिशा दी होगी । मेरे साथ भी बाबा ने दो माह के अन्तराल मे ही ऐसा चमत्कार दिखाया की मेरे विश्वास की नीव ही बाबा ने पक्की कर दी । मैं    देहरादून मे बाला वाला ग्राम का रहने वाला हू । मैं विन्द्लास फार्मा मे सर्विस करता था । वेतन भी बहुत अच्छा मिलता था । लेकिन मैं देहरादून मे ही घर के पास  सर्विस करने से संतुष्ट नही था ,जबकि मुझे मेरे साथ वाले बहुत ही लक्की कहते थे , क्योकी एजुकेशन पूरी करने के बाद घर के पास ही इतने अच्छे वेतन की सर्विस जो मिल गयी थी । 

मैं देहरादून से बाहर जाकर सर्विस करना चाहता था । हमारे घर से दो -तीन किलोमीटर की दूरी पर ग्राम नकरोन्दा-बाला वाला मे गुलर घाटी  मार्ग पर शिरडी साई बाबा का मन्दिर है । अक्सर गुरुवार के दिन मैं मन्दिर जाता ही था । एक दिन मेरे मन मे आया की मैं बाबा से ही कही घर से बाहर की सर्विस के लिये मन्नत करलू । एक गुरुवार को मैने बाबा से प्रार्थना की , यदि बाबा आपने मेरी सर्विस देहरादून से बाहर लगवा दी तो मैं आपके मन्दिर मे प्रसाद अर्पण करूँगा  ।

 इस बीच मुझे चार -पाच स्थानों के बहुत अच्छे जोब् ओफर भी मिल चुके थे । परन्तु मैं तो देहरादून से बाहर ही सर्विस चाह रहा था । मुझे लगा शायद बाबा अपने प्रति श्रद्धा और सबुरी  की परीक्षा ले रहे हैं । लेकिन मुझे तो बाबा पर पूर्ण श्रद्धा थी । ठीक उसी समय हिमाचल प्रदेश मे एक फार्मा कम्पनी मे नियुक्ति हेतु विज्ञापन निकला और मैने आवेदन कर दिया । बाबा की कृपा देखिये की मुझे  कम्पनी द्वारा साक्षात्कार हेतु बुला लिया गया । बाबा के आशीर्वाद से मैं दो माह के अन्दर ही देहरादून से  बाहर हिमाचल प्रदेश मे एक बहुत अच्छी सर्विस पा गया । ऐसा बहुत ही कम देखा गया है जब एक साधारण व्यक्ति इस प्रकार का प्रयास करे और उसकी मेहनत सफल हो जाये । ये तो बाबा ही हैं जो अपने भक्तो की हर मनोकामना को पूर्ण करते हैं । विशेष कर इस मन्दिर मे स्थित गुरु स्थान का तो बहुत ही anokhaa  महत्व है जहा बाबा अपने भक्तो की मनोकामना को पूर्ण कर आशीर्वाद देते  हैं । 

ऋषि चन्दोला-बाला वाला ,देहरादून 


Saturday, January 7, 2012

Miracle in Shirdi - Sai Baba's darshan in Dwarakamai !

A Miracle occurred in Shirdi on the night of Thursday 05th Jan`2012.

Right after Baba's Shej Aarti got over, an image of Sai Baba's face appeared on the wall of Dwarkamai.
Very distinctly seen, the face of Sai Baba appeared on the Nimbar (Niche) which is on the western wall of Dwarkamai.

The Shri Sai Satcharitra relates that it was here that Baba used to have his midday meal, sitting behind a curtain with his back to the Nimbar, and a row of devotees on either side of him.This is also the place where Baba would sleep with his head pointing towards the Nimbar.

Sai Baba also occasionally did his Namaz (ritual prayers) here.This Nimbar also has a set of lamps placed by Baba in-front of it.

As this news spread, people from all over started rushing to Shirdi to be blessed by this miracle of Baba.
And slowly the crowds grew in such numbers that Shirdi Sansthan's Security guards also found it difficult to control them.

Chanting the name of Sai Baba, the inside & outside of Dwarkamai was flooded with devotees, all trying to get a glimpse of Baba's Image.

Sai Childrens Academy at Saisthanam, Dehradun

Child Education Sponsorship

was formed on 4th July 2002 by Smt Sawitri Bhatt (W/o Late Pt. Surendra Dutt Bhatt). 

In 2009 with blessings of Shirdi Saibaba we started a school named “Sai Childrens Academy”.

Right now there are 20 children from Nursery to Vth standard.

Child Education Sponsorship is a unique relationship between you and your sponsored child.

When you become a Saisthanam Sponsor, you will help a child break free from the clutches of poverty and gift the child a future full of hope. It is also a relationship that extends to the child's family and the community.

You can make a lasting impact by donating Rs 500/- a month.

Your sponsorship will provide a needy child, life's essentials like education, safe drinking water, basic healthcare, food and immunization against killer diseases.

The Updates regarding this temple and charitable trust will be updated on the Website www.saisthanam.com

Join this Divine Temple and help in its major expansion.

For any details regarding Child sponsorship and donations, kindly contact

Sai Bhakt Devendra Bhatt - 094120 54471

Baba bless us all
Regardless of the size of your contribution
or the motivation behind it,
we are deeply grateful for your belief in our work.

Friday, January 6, 2012


On 24th Dec`2011, a group of 60 American Sai devotees & their Sufi Leader Murshida Carol Weyland Conner  visited Shirdi to pay their obeisance to Sai Baba. Dr.Conner who is the present head of 'Sufism Reoriented' - a spiritual organization established by Meher Baba in 1952 in California`USA to impart Sufi education, feels that India is the "Motherland of the Earth"...

Thursday, January 5, 2012

साई के आशीर्वाद से नौकरी मिली

साई के आशीर्वाद से नौकरी मिली 
मेरे साई की कृपा जब भक्तो के उपर होती होगी ,तो कुछ ऐसे ही होती होगी जैसे बाबा ने मेरे साथ की । मैं सविता रावत् देहरादून मे रायपुर की रहने वाली हू । मेरे परिवार मे मेरी मा और दो बडी बहने हैं ।पिताजी सेना मे थे, उनका स्वर्ग वास  हो गया था ,मेरी मा ने जैसे-कैसे हम तीनों बहनों को पडाया-लिखाया ।मै एक पब्लिक स्कूल मे जोब् करती थी । क्योंकि घर - परिवार का खर्च चलाने के लिये हम तीन बहनों के अतिरिक्त कोई और सदस्य नही है,तो मेरी चिंता सरकारी नौकरी के  लिये बढ  गयी । 

मैं चाहती थी की यदि सरकारी जोब् मिल गयी तो हम सबका भरण-पोषण आराम से हो जायेगा । मेरी चिंता को देख कर वही स्कूल मे एक रूचि नाम की सीनिअर मैडम ने बताया की चार-पाच किलोमीटर की दूरी पर एक साई स्थानं नाम से , सिद्ध पीठ साई मन्दिर है, तुम कभी वहा गयी हो, वहा सच्चे मन से की गयी हर प्रार्थना पूरी होती है । उसी समय शिक्षा विभाग  मे ऐल.टी.ग्रेड के लिये वैकेन्सी समाचार-पत्र निकली, तो मैने भी बाबा के  नाम लेकर फ़ार्म भर दिया । 

एक दिन मैं बाबा से आशीर्वाद लेने के लिये भी अपनी बहन के साथ  साई मन्दिर जो की गुलर घाटी मार्ग , नकरोन्दा-बाला वाला मे है, गयी और बाबा से संकल्प किया की यदि मुझे इस परीक्षा मे पास करवा दिया तो बाबा मैं आपके नाम से भण्डारा करुगी । 

इस निमित्त मैने प्रत्येक गुरुवार के उपवास भी रखने शुरु किये, और बाबा के मन्दिर मे निरंतर जाना शुरु रखा |  बस बाबा ने अपना आशीर्वाद देना शुरु कर दिया । इस बीच एक कुत्ते ने मुझे काट भी लिया, डाक्टर ने बताया की कुत्ते को देखते रहना की वो मर ना जाये । यदि मर गया तो समझना, कुत्ता पागल था । दो दिन बाद वास्तव मे वह कुत्ता मर गया ।क्योकि मालूम चला की वह पागल था, मैं बहुत घबरायी हुई थी । बाबा का नाम लेती रही, डॉक्टर ने मुझे कुत्ते के इंजेक्शन लगवाये । लेकिन मैं समझती  हू ऐसे मामलो मे इंजेक्शन भी कहा काम करते हैं जब पागल कुत्ता काट जाये।

परन्तु मुझे तो बाबा पर पूर्ण विश्वास था । मेरी बाबा ने पूर्ण रक्षा की । मेरी परीक्षा का परिणाम भी घोषित होने वाला था। मेरी मा को परिणाम वाले दिन की पूर्व रात्रि को बाबा ने स्वप्न मे दर्शन देकर कहा की तेरी बेटी पास हो गयी।  सुबह मेरी मा ने मुझे  बताया कि सविता, रात बाबा ने सफ़ेद् वस्त्रो मे मु झे दर्शन देकर कहा की जा तेरी बेटी पास हो गयी ।  आज तेरा रिजल्ट तो नही आगया । अब तू जाकर अपना परिणाम देख तो। मैं तो घबरायी हुई थी की मालूम नही कैसा रिजल्ट होगा, मेरी जाने की हिम्मत नही हो रही थी । मेरी बहन कहने लगी चल नेट पर देख लेते हैं । 

जब रिजल्ट देखा तो बाबा के आशीर्वाद से मैं पास हो गयी थी । थोडे ही समय के पश्चात मुझे दिसंबर २०११ मे ज्वाइनिन्ग लेटर भी मिल गया, वो भी गुरुवार के दिन। मैने बाबा से वचन किया था  की मेरे पहले वेतन से मैं उद्द्यापन भी करुगी और भण्डारा भी करुगी । आखिर वह दिन ५ जनवरी २०१२ गुरुवार का आ गया जब मैने अपनी बडी दो बहनों तथा मा के साथ साई स्थानं साई मन्दिर जो वास्तव मे सिद्ध पीठ स्थान है ,उद्द्यापन का  पूजा-पाठ व हवन इत्यादि कर अपना संकल्प पूरा किया । रुचि मैम के मार्गदर्शन से मुझे बाबा का आशीर्वाद तो मिला ही, पर  मेरे जीवन मे  बाबा ने इस इस प्रकार का चमत्कार किया तो  मेरे पूरे परिवार मे बाबा के प्रति पूर्ण श्रद्धा हो गयी । 
सविता रावत ,शिक्षिका ,रायपुर ,देहरादून ,उत्तराखण्ड्।